Tuesday 21 August 2007

हंगामा बरपा है

लोगों को सड़क पर हंगामा करते देखा होगा एक बार नहीं हज़ारों बार लेकिन क्या कभी गौर किया हैं कि उनका मकसद क्या होता हैं। क्या वे किसी मुद्दे के लिए फोकस होते हैं। आज कि ही बात ले लीजिये रांची में आदिवासियों ने हंगामा किया, उन लोगों ने परिसीमन के विरोध में बंद बुलाया था। हंगामे में हुआ क्या नौजवानों कि फ़ौज सडकों पर निकली सामने जो भी आया उसे तोड़ते, बर्बाद करते वे गुजर गए।
अगर उनका विरोध सरकार कि किसी नीति के खिलाफ हैं तो इसमें गराबी फूल वाले कि क्या गलती। उसका ठेला तोड़ने, समान फेंकने का क्या मतलब। नीति उसने बनाईं है या लागु वो कर रह हैं। हमला उसपर क्यों, वो भी तो उसी भीड़ में से हैं जो पीड़ित हैं। दरअसल वे नीति का विरोध नही कर राहे उस मकसद से सडकों पर निकले भी नहीं। वे तो अपना अपना ग़ुस्सा अपनी अपनी मुश्किलों के खिलाफ निकलने आये हैं। वे सरकार से लड़ना नहीं चाहते हिम्मत ही नहीं हैं बस मन का ग़ुस्सा हैं वो निकलना हैं सो जो भी सामने आये तोड़ डालो उसे खत्म कर दो।
शीशे तोड़ो, सड़क किनारे दुकान लगाने वालो कि दुकान बर्बाद कर दो, स्कूटर पर कम से जा राहे निरीह अपने ही हिस्से पर हमला कर दो, इससे मिलेगा क्या कभी नहीं सोचा। इस विरोध से सरकार पर क्या फर्क पड़ेगा उसका क्या बिगाड़ लिया। बर्बाद तो वे हुए जिनका इंश्योरेंस भी नहीं हैं। साहब बड़ा जोरदार विरोध प्रदर्शन हैं बड़ा सफल प्रदर्शन रहा। जो मिला उसे तोड़ा कुछ भी नहीं छोड़ा कुछ नहीं मिला तो बचकर दुबककर जाते लोगों को तोड़ा। एक सरकारी स्कुल का एक टुटा शीशा लगने एं सालो लगजाते है kaun sochta है। टूटे कि आदत पड़ा गई हैं साबुत और सही सहन नहीं होता हैं शायद। ऐसा लगता हैं कि कही भी कोई भी विरोध प्रदर्शन हो नौजवान आजकल सिर्फ तोड़ने का मजा लेने जाते है।
मेरी गुज़ारिश हैं अपने नौजवान दोस्तो से कि उनमें बहुत ताकत हैं, उसका विवेक के साथ इस्तमाल करें। अगली बार जब किसी नीति का विरोध करने जाये तो पुख्ता preparations के साथ जाये, सिर्फ तोड़ने और मन का ग़ुस्सा निकलने नहीं। आपमें ताकत हैं मजबूर कर दो सरकार को कि वह आपकी सुने, अपनों पर ही हमला करके तकतावारों को मदद ना करें।